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सबसे पहली बात तो ये व्यंग नहीं है…एक घटना या कहें दुर्घटना है…। आम तौर पर तो चूहा मरने के लिए ही होता है…हम सबने कितने चूहे मारे हैं… चूहा मार दवाईयां लाए हैं। चूहादानी में चूहें फंसा कर तालाबों में चूहों को जिंदा डुबोया है… सरकार तो चूहे मारने पर पैसे देती है…लेकिन फिर भी चूहे को मारने और किसी चूहे को मरते हुए देखने में बहुत अंतर है। जान जान होती है, चाहे एक इंसान सड़क पर तड़पता हुआ मिले, या एक चूहा… कुछ ऐसा ही हुआ एक सड़क पे…

 वो अभी बहुत छोटा था, उसके शरीर में हल्का गुलाबीपन, उसके छोटे छोटे पैर, आंखों में चमक…जैसे बहुत कम समय में, बहुत सारी दुनिया देख लेना चाहता हो…कम से कम अभी उसके मरने की उम्र नहीं थी। मुझे नहीं मालूम कि चूहे सपने देखते हैं या नहीं, लेकिन जिस उम्र का वो था, उस उम्र में एक खुशहाल जिंदगी के सपने देखना कोई बहुत बड़ी ख्वाहिश नहीं थी। लेकिन मौत कभी उम्र नहीं देखती…

 अगर वो किसी चूहेदानी में, या चूहामार दवाई खाकर मरा होता तो शायद उतना दुख नहीं होता, क्याकि हम अपने दिल को बहला लेते, कि इन चूहों के भाग्य में यही सब है, अच्छा हुआ उसे मुक्ति मिल गई… लेकिन जिस तरह की मौत उसे नसीब हुई थी, वो उस नन्ही जिंदगी के साथ नाइंसाफी थी। 

 उसने जिस घर में जन्म लिया था, शायद उस घर में Painting का काम चल रहा था, और वो नन्ही जान, खाने के लालच में या न जाने कैसे एक Paint के डब्बे में गिर गया… उसका पूरा शरीर मोटे Paint से ढका हुआ था, और उसके शरीर का आधा हिस्सा, अब भी उस Paint के ढेर में फंसा हुआ था, जो अब सूख चुका था, और सीमेंट की तरह पक्का हो गया था…न जाने कितने दिनों से वो फंसा हुआ होगा, भूख प्यास से बेहाल, और शरीर की शक्ति उस सूखे Paint से बाहर निकलने में जा रही थी…

इंसानियत के नाते, जिस परिवार में वो Paint के डब्बे में गिरा था, उस परिवार ने इतना किया कि उसे एक प्लास्टिक की थैली में डालकर, सड़क किनारे रख कर अपने कर्तव्य को पूरा समझ लिया…लेकिन यहां चूहे को अब दो चीज़ों से संघर्ष करना था…एक वो धीमी मौत जिसमें उसका आधा शरीर फंसा हुआ था…और बिना खाना और पानी के शरीर भी अब बचाव में साथ् नहीं दे रहा था…और दूसरी मौत वो जो सड़क पर उसे एक झटके में लीलने को तैयार थी…एक फंसा हुआ जिंदा चूहा…कुत्तों के सामने वैसा ही है, जैसे सड़क पर पड़ी हुई नाटों की नई गड्डी…भला कौन नहीं उठाना चाहेगा…

 मैं ये भी नहीं जानता कि चूहों को रिश्तों नातों की समझ होती है, लेकिन उसके बाप को, मां को कैसा लग रहा है, अगर वो छिप के देख रहे होंगे, कि उनकी संतान को इतनी छोटी सी उम्र में, जिंदगी और मौत का सघंर्ष झेलना पड़ रहा है…

 कुत्तों को इस बात की भनक लग गई थी, कि ये चूहा भाग नहीं सकता, बस अब इंतज़ार इस बात का था, कि उसे खाएगा कौन और कैसे खाएगा… कुत्तों ने अपने शिकार पर घेरा बनाना शुरू कर दिया था…और शायद उस नन्ही जान को भी ये एहसास हो गया था, कि मौत से उसे कोई नहीं बचा सकता…लेकिन फिर भी मरते हुए इंसान को भी जिंदगी से तो प्यार होता ही है…ये तो चूहा था…उसने अपने बेजान शरीर से आखिरी कोशिश करनी शुरू कर दी…कि शायद कोई चमत्कार हो जाए…कोई ऐसा फरिश्ता आ जाए, जो उसे बचा ले जाए…लेकिन फरिश्तों की नज़र में भी चूहा तो एक चूहा ही है…उसकी जान बचाने में कौन सा फरिश्ता अपना time waste करेगा…

 तमाशबीनों के लिए चाहे चूहा मरे या इंसान, भीड़ में खड़े होना आदत होती है… मैं भी उन्ही तमाशबीनों में था, जो चूहे के सघर्ष को देख रहा था…तब पता चला कि चूहे को मारने और एक मरते हुए चूहे को देखने में कितना फर्क है…चूहा मर रहा था। मैं बस इतना ही कर सका कि एक लकड़ी से उस चूहे को, ऐसी जगह धकेल दिया, जिस जगह शायद कुत्ते उसे न ले जाएं, लेकिन ये बात मैं भी जानता था, और वो चूहा भी…कि ये मौत को कुछ देर धकेलने की ही कोशिश है…बल्कि मौत अगर सामने हो, फिर भी न आए, तो ऐसी जिंदगी मौत से भी बदतर होती है….पर यहां तो हम तमाशबीनों में, उस चूहे की मौत भी खड़ी थी, शायद ये देखने कि कोई कब तक उससे बच सकता है…

 मुझे नहीं मालूम कि फिर उस चूहे का क्या हुआ, चूहा था तो मरा ही होगा…लेकिन मैंने मन में दुआ पढ़कर अपना फर्ज निभा लिया, कि अगले जन्म इसे चूहा मत बनाना, और अगर बना भी दिया, तो कम से कम इसे चूहे की मौत मत मारना…उस चूहे का संघर्ष आज भी मेरी आंखों में तैर रहा है…भगवान उसकी आत्मा को शांति दे…

 © RD Tailang (Mumbai)