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 गाजर का हलवा बड़ा स्वादिष्ट होता है.. इसको खाने में बड़ा मज़ा आता है.. लेकिन अगर आप देश के चार महानगरों में नहीं रहते हैं, तो गाजर का हलवा सिर्फ ठंड के मौसम में, यानि नवंबर से लेकर मार्च तक ही बनाया और खाया जा सकता है..। जिस तरह गाजर के हलवे का एक मौसम होता है, ठीक उसी गाजर मूली की तरह हमारे देश में मौसम आता है, Awards का..।  इस मौसम में, दीवाली से लेकर होली तक, देश में इतने सारे Awards बंटते हैं, जितने पूरी दुनिया में पूरे साल भर भी नहीं बांटे जाते होंगे..। टेलीविज़न पर इन तीन चार महीनों में मज़ाल है कोई ऐसा Sunday आ जाए, जिस दिन शाम को कोर्ई Awards न आ रहा हो.. और जिन Channels में कोई Awards नहीं आ रहा होता है, वो Awards से इतना प्यार करते हैं, कि पुराने, पिछले साल का Awards ही फिर से दिखा देते हैं..। TV पर Awards के इसी प्रेम से प्रेरित होकर, आईए हम आपको बताते हैं, कि कैसे बनते हैं ये Awards..

 

सामग्री :  

भारत में Awards बनाने वाले कई हलवाई बाज़ार में बैठे हैं। जिस हलवाई का जितना बड़ा नाम, उसका award भी उतना बड़ा..। लेकिन Award बनाने वालों की List में शामिल होने के लिए ये जानना सबसे ज़रूरी है, कि आपसे कोई Award क्यूं ले। इसके लिए, या तो आप कोई अखबार के मालिक हों, या फिर फिल्मी गपोड़वाज़ी वाली पत्रिका निकालते हों.. या फिर किसी ऐसे Channel को चलाते हों, जिसकी TRP अच्छी खासी हो.. या फिर कोई ऐसी गुटखा कंपनी चलाते हों, जिसके लिए कई फिल्मी सितारे विज्ञापन करते हों।

 

दूसरी सामग्री जो Awards बनाने के लिए चाहिए वो है, Award Functions की पहली Line में बैठने वाले कुछ कुछ अच्छे चेहरे। इसमें अमिताभ बच्चन का होना बहुत ज़रूरी है, और उनके आसपास ही कहीं दूसरी या तीसरी Row में रेखा का बैठना भी आवश्यक है, क्योंकि जिस Channel पर ये Awards Show आने होते हैं, उसको अमिताभ की बात पे, रेखा का, और रेखा की बात पे अमिताभ का Rection दिखाने की बड़ी पुरानी और गंदी आदत होती है। वैसे कुछ लोगों ने आजकल शाहरूख खान और प्रियंका चोपड़ा से भी काम चलाना शुरू कर दिया है.. ।

 

इसके अलावा एक बहुत ज़रूरी सामग्री है, Lifetime Achievement Awards की। कायदे से तो ये सम्मान उस पुराने कलाकार को मिलना चाहिए, जिसने फिल्मी जगत में अपना बहतरीन योगदान दिया हो, ताकि ऐसे कलाकार का परिचय आज की पीढ़ी से हो सके, वो भी उसके योगदान से रूबरू हो सके। लेकिन इस तरीके ये पूरा Segment बड़ा उबाऊ सा हो जाता है, और लोगों के Channel बदलने का खतरा सर पर मंडराता है।  इसलिए हमारे Award बनाने वाले हलवाईयों ने इसका एक नया तरीका निकाला है..। ये Awards वो किसी ऐसे पापा, मम्मी, चाचा या daddy को देते हैं, जिनके बेटे या बेटी, इस वक्त सफल् हैं..। इस “Celebrity Daddy या Mummy” वाले एक “तीर” से कई शिकार हो जाते हैं। एक तो वो Hero खुश हो जाता जिसके daddy को ये Award मिलता है, और वो खुश होकर, free में या कम पैसों में dance कर देता है। इसके अलावा Hero अपने पापा के लिए एक Emotional Speech भी दे देता है, जो Channel में कई दिन तक Promo moment का काम करती है। फिर कोई माई का लाल ये सवाल भी नहीं कर सकता कि ‘भई इनसे भी बड़े बड़े दिगज्ज पड़े हैं, उनको ये Award क्यों नहीं, और पापाजी को ये Award क्यों..?’ और आखिर में, पापाजी के सम्मान में भले कोई चाहे न चाहे, लेकिन बेटा जी के सम्मान की खातिर सब लोग खड़े हो जाते हैं, जिससे ये आभास होता है, कि देखा Industry हमारे पुराने लोगों का कितना सम्मान करती है.. और standing ovation देती है.. ।

 

अब एक और जो सबसे बड़ी ज़रूरी सामग्री चाहिए, वो है Host. ये Host ऐसे होने चाहिए जिन्होंने भले ही आजतक कोई Functions host न किया हो, लेकिन इनकी कोई फिल्म ज़रूर पिछले 2-3 महीनों में आई हो। ये भले दो Line पढ़कर भी ठीक से न बोल पाएं, लेकिन इन्हें Comedy करना आना चाहिए.. जी हां, हमारे देश में Awards Function Comedy Circus या नौटंकी से कम नहीं होते। ये Host किसी भी रूप में आ सकते हैं, ये महिला बन कर आ सकते हैं, ये कोई Character बनकर भी आ सकते हैं। Host जितनी उटपटांग हरकते Stage पर करेंगे, Award Functions की शोभा में उतने ही चांद लगते जाएंगे। 

 

Award बनाने का तरीका

सामग्री के बाद, आईए हम आपको इन Awards को बनाने की विधि बताते हैं।

सबसे पहले एक किसी ऐसे Writer को पकड़िए, जिसकी Comedy पर अच्छी पकड़ हो..। इस Writer की सहायता से, एक ऐसी चटपटी मसालेदार Script तैयार करवाईए जिसमें फिल्मों की, खासतौर से Flop फिल्मों और उसके actors की जमकर Insult की गई हो.. (चिंता मत करिए, awards का भले इन बातों से कोई लेना देना न हो, लेकिन हमारे यहां awards इसी तरह पेश किए जाते हैं।) इन Insulting बातों को लेकर, stage पर किसी से कहासुनी बहस या लड़ाई झगड़ा हो जाता है, तो ये कोई समस्या नहीं, बल्कि फायदे की बात है.. क्योंकि ये तो उत्तम TRP की Gurantee है।

 

अब इस Script को Hosts के साथ मिलकर खूब पकाईए.. इतनी पकाईए कि अगर ये पकाऊ भी हो जाए, तो कोई नुकसान नहीं..। अगर Award Functions के Boring Jokes पर कोई नहीं हंस रहा है तो चिंता करने की जरूरत नहीं, क्योंकि बाद में इनके पीछे Stock Laughter Track यानि गोदाम में पड़ी हुई हंसी की पुरानी Recording बजा दीजिए, देखने वाले दर्शक को ये लगेगा कि पूरी Industry हंस हंस के लोटपोट हो रही है, शायद ये Joke उसे ही समझ में नहीं आया।

 

Award को बनाते समय इस बात का ध्यान रखना ज़रूरी है, कि हो फिल्मी हस्तियां इसे देखने आएं, वो कम से कम 5 Min ज़रूर बैठें..। क्योंकि उनके 5 Min के shots की Recording को आप पूरे तीन घंटे बार बार इस्तेमाल कर सकते हैं। शायद इसीलिए, आपके अक्सर देखा होगा कि TV पर अमिताभ बच्चन, जो ताली Shahrukh Khan के dance के लिए बजाते हैं, वही ताली Yash Chopra के Lifetime achievement Award के लिए भी काम आती है। 

    

अब सबसे ज़रूरी बात, आप ये तय कर लीजिए, कि आप awards उन हस्तियों को ज़रूर दें जो आए हैं, यदि उन्होंने कोई award नहीं भी जीता है, तो कोई ऐसी category बना दें, जिसमें उनकेा award मिल जाए.. वर्ना अगली बार आप अपने award में उनके पधारने की आशा मत कीजिए..।

 

आखिर में, भले खर्चा ज़्यादा हो जाए, लेकिन ये ज़रूर तय कीजिए कि आपके Awards में कोई Super star ज़रूर ठुमका लगा रहा हो.. क्योंकि इस सुपरस्टारी ठुमके के कई फायदे हैं। पहला फायदा तो आपके awards को एक नाम मिल जाता है, कि “भई उसमें तो फलां फलां नाच रहा है, ज़रूर कोई बात होगी”। दूसरी बात इस सुपरस्टारी ठुमके के कारण आपको किसी main channel पे अपना कार्यक्रम बेचना आसान हो जाएगा और कीमत भी अच्छी मिल जाएगी.. और तीसरी बात ये कि आप इस सुपरस्टार को आखिर में नचवाएंगे, इसलिए सारी Industry तब तक जमकर बैठी रहेगी, कि कहीं हमारे सुपरस्टार साहब बुरा न मान जाएं..।

 

ये कुछ नुख्से हैं, जिनकी सहायता से आप इस देश में एक अच्छा सा, टिकाऊ सा, और बिकाऊ सा award show बना सकते हैं। आशा है, मेरी इस जानकारी से, इस देश की हर गली, मोहल्ले और घरों में कुछ नए नए awards का जन्म होगा, जो हमें आने वाले भविष्य में TV पर देखने को मिलेंगे..। 

  

RD Tailang

Mumbai

 

  

जिस दिन Jia Khan ने खुदकुशी की, उसके ठीक दो दिन बाद “Page 3 निवासी” Shobha De उठीं, एक काले Paint का डब्बा उठाया, और चल दी Bollywood पर कालिख पोतने। उन्होंने और उन जैसे कई और “Page 3 निवासियों” ने अपने अपने लेखों में Film Industry की धज्जियां उड़ा दीं। ऐसा लगने लगा मानो Bollywood film sets पर नहीं, होटलों के बिस्तरों में पाया जाता है। यहां लोग फिल्म बनाने के लिए इक्ठ्ठे नहीं होते, बल्कि शराब, लड़कियां और Drugs में डूबने के लिए मिलते हैं। Shobha De की मानें तो फिल्म जगत वो अंधा कुंआ है, जिसमें जो भी झांकता हैं, मौत के काले अंधकार में समा जाता है। Shobha De के Bollywood के आगे, Al qaida और Taliban रामराज्य जैसे लगने लगे।

 

इससे आगे का लेख Shobha De और उन जैसे कई और “Page 3 निवासियों” के लिए मेरा जवाब है।

 

मुझे पक्का यकीन है Shobha de ने अपनी जिंदगी में, कभी न कभी फिल्में लिखने का ज़रूर सोचा होगा, नहीं तो इतनी कोशिश ज़रूर की होगी कि उनकी कहानी पर फिल्म बने, ये भी नहीं तो फिर अपनी किसी किताब को फिल्मी हस्ती से Lauch कराने की कोशिश ज़रूर की होगी.. ये सब न भी हुआ हो, तो उन्होंने ज़रूर फिल्मी दोस्त बनाने की कोशिश की होगी, बनाए होंगे, और इस समय भी उनके फिल्मी दोस्त होंगे। लेकिन अचानक Shobha De को ये फिल्मी दुनिया अंधेरी और बुराई की दुनिया नज़र आने लगी, क्योंकि Jia Khan ने व्यक्तिगत कारणों से खुदकुशी कर ली।

 

लोग कहते हैं, कि फिल्मी दुनिया में सिर्फ Success चलती है, और जो सफल होता है, लोग उसी के पीछे भागते हैं। जी हां ऐसा होता है, बिल्कुल होता है, क्योंकि सफल् आदमी सबके सामने होता है, हंसता, खुश, मुस्कुराता, अपनी सफलता पे इतराता.. और असफल आदमी खुद ही दुनिया से छुपता छुपाता, दुनिया के सामने आने से डरता है, इसलिए वो किसी के सामने, किसी के ख्याल में भी नहीं होता। Shobha De के चाहने वाले तो फिल्मी दुनिया से नहीं हैं, फिर उनमें से कितने चाहने वाले हैं, जो उनके पति को भी जानते होंगे, वो क्या करते हैं, खुश है, या दुखी हैं, किसी को क्या पता। और ऐसा ये फिल्मी दुनिया में नहीं होता, हर जगह होता है..। Veshno Devi सफल् मंदिर है, इसलिए लोग गिरते पड़ते भी पहाड़ चढ़ कर पहुंच जाते हैं, वहीं, एक शहर के कोने में अनजान मंदिर धूल खाता खंडहर होता रहता है, कोई वहां झांकता भी नहीं है, क्योंकि वो सफल नहीं है। Shobha de लेखन की दुनिया से जुड़ी हैं, क्या उन्होंने खुद कभी ये ख्याल रखा है, कि KP saxena ने फिल्म Lagaan के Dialogue लिखने के बाद क्या किया, क्या उनकी कोई और किताब आई, उनका घर का खर्चा कैसे चल रहा है? उन्हें अखबार की दुनिया के कितने लोगों का पता है, कि वो किस हालत में अपनी गुजर बसर कर रहे हैं।

 

चलिए लेखन की दुनिया को छोड़ते हैं, Business World से ही ले लें, कभी अंबानी ने चिंता की कि Mobile आने के बाद बेचारा Pager Manufacturer क्या कर रहा है, उसका घर कैसे चल रहा है। या Pen drive आने के बाद Floppy maker क्या कर रहे हैं, या Reliance Fresh के बाद Local सब्जी वाला अपना घर कैसे चला रहा है। जिस तरह से बाहर की दुनिया में हर एक इंसान की देखभाल नामुमकिन है, उसी तरह फिल्मी दुनिया में कौन अपने Flat में क्या कर रहा है, इसकी खबर रखना नामुमकिन है। और ऐसा भी नहीं है, जब भी फिल्मी दुनिया को किसी के बारे में पता लगा है, तो उसने दिल खोल कर उस इंसान की मदद की है। अगर सैकड़ों किसानों की आत्महत्या के बाद भी महाराष्ट्र अगर काला राज्य नहीं हुआ, तो Jia Khan की मौत के बाद फिल्मी दुनिया काली और गंदी दुनिया कैसे हो गई।

 

किसी का आत्महत्या करना उस इंसान की मानसिक हालत पर निर्भर करता है। आत्महत्या करने के बहुत से व्यक्तिगत कारण होते हैं। लेकिन ये आरोप लगा है, कि Jia को Industry ने काम नहीं दिया, इसलिए वो बहुत परेशान थी । इस हिसाब से तो देश के हर उस नौजवान को आत्महत्या करनी चाहिए जो बरसों नौकरी के लिए ठौकरें खाते रहते हैं। उस फिल्म निर्माता को आत्महत्या कर लेनी चाहिए, जिसकी करोड़ों रूपये और बरसों की मेहनत के बाद बनाई गई फिल्म को जनता और Critics दो मिनिट में बरबाद कर देते हैं। या फिर उस साबुन निर्माता को भी आत्महत्या कर लेनी चाहिए, जिसके Product की तरफ जनता देखती भी नहीं। जब हम इन घटनाओं के लिए जनता को जिम्मेदार नहीं मानते तो फिर किसी एक Hero या Heroine की मौत की जिम्मेदार पूरी फिल्मी दुनिया कैसे हो जाती है?

 

ज़रा इस तरफ भी देख लिया जाए, जब कोई Hero या Heroine सफल होते है, तो वो कितने लोगों से अपना नाता तोड़ लेते है। वो खुद भी तो अपने इर्दगिर्द एक ऐसा मजबूत दायरा बांध लेते है, जिसको भेद पाना मुश्किल होता है। वो अपनी सफलता के साथ खुद अकेले अच्छा महसूस करते है, फिर होता ये है, कि लोग धीरे धीरे उससे कटने लगते हैं, उसको उसकी मर्जीं के हिसाब से अकेला छोड़ देते हैं। लेकिन जब सफलता चली जाती है, तो बाहरी दुनिया से वो इंसान कट चुका होता है, और अंदर की दुनिया में उसके पास कोई बचता नहीं है..। उसके अकेलेपन की किसी को भनक भी नहीं लगती है, कि इस दायरे के अंदर एक अकेला इंसान है जो अब दुखी हो रहा है। जब आप किसी को अपनी सफलता में शामिल नहीं करते, तो वो आपकी असफलता में भी शामिल नहीं होता। अमिताभ बच्चन को छोड़कर ऐसे कितने कलाकार हैं, जो अपने प्रशंसकों की हर चिठ्ठियों के जवाब भेजते हैं। उनकी तरह कितने लोग हैं, जो अपने चाहने वालों को नाम के साथ जन्म दिन की शुभकामनाएं अपने Blog पर देते हैं। जब आप लोगों की उम्मीदों को रोंद कर उनसे कट जाते हैं, तो ये उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए, कि लोग अपने आप आके आपसे जुड़ जाएं। किसी को सपना नहीं हो रहा है, कि आपके साथ जीवन में क्या घट रहा है।    

 

फिल्मी दुनिया ही क्यों, एक कलाकार की तनहा मौत का जिम्मदार आम जनता को भी क्यों न बनाया जाए, क्योंकि जब वो कलाकार Hit होता है, सफल् होता है तो यही जनता उसका पीछा करती है, घंटों घर के बाहर इस आशा में खड़ी रहती है, कि वो अब आएगा और 10 Second हाथ हिलाकर चला जाएगा । वो किसी को अपनी Shooting का, अपने Hotel का पता नहीं बताता है, फिर भी ये जनता किसी भी तरह से उसका पता लगा कर वहां पहुंच जाती है, वो अपने Honeymoon पर हो, Dinner पर हो, या किसी के अंतिम संस्कार में, ये जनता वहां भी उसका नाक में दम कर कर देती है, लेकिन यही जनता तब क्यों पता नहीं लगाती है, जब वो कलाकार परदे से सालों साल गायब रहता है। Rajesh Khanna के अंतिम दिनों में कितने उनके चाहने वाले उनके घर पर खड़े रहते थे? उनको खून से ख़त लिखने वाली लड़कियां उनके अंतिम दिनों में अपनी चाहत का एक भी ख़त क्यों नहीं लिख पाईं, शायद ऐसा कोई एक ख़त उनकी जिंदगी में चंद दिनों का और इज़ाफा कर देता। Nishabd के बाद कितने ही ऐसे लोग होंगे जिन्होंने Jia Khan के Posters अपने Bedrooms में लगाए होंगे, क्या हो गया था उनको, अब वो Jia के घर बाहर क्यों नहीं खड़े रहते थे.. क्योंकि एक भी प्रशंसक ने Facebook या Twitter पे लिखा हो, कि We miss you jia.. 2010 के बाद तुम्हारी कोई फिल्म क्यों नहीं आई। लोग कहते हैं, Shamshad Begum की बहुत ही गरीबी में मौत हुई, ऐसी मौतों के लिए अगर फिल्मी दुनिया जिम्मेदार है, तो आम जनता या वो लेखक भी तो जिम्मेदार हैं, जो मरने के बाद Facebook या Twitter पे RIP Golden Voice of India लिखते हैं। आज तक किसी ने ये सवाल तो नहीं उठाया कि जब Meeka और Atif Aslam गा सकते हैं, तो Shabbir Kumar, Mohd Aziz, Kumar Sanu को कोई गाना क्यों नहीं मिल रहा है..?

 

फिल्मी दुनिया को Target बनाना बहुत आसान है, क्योंकि ये दुनिया जवाब नहीं देती। ये दुनिया किसी से हाथापाई नहीं करती.. सबका खुली बाहों से स्वागत करती है। कितनी ऐसी कहानियां हैं, जहां राह चलता इंसान यहां आकर दुनिया की आंखों का तारा हो गया। कहते हैं ये बेरहम दुनिया है, मैं उन लोगों से कहना चाहता हूं, कि अगर इस दुनिया के दिल नहीं होता तो शायद आधे से ज्यादा Super stars और Heroines उन्ही सड़कों पर घूम रहे होते जहां से वो उठकर आए हैं। फिल्मी दुनिया का सब कोई बाप बनना चाहता है, इसके बारे में सब अपनी राय देना चाहते हैं। फिल्में बनाता कोई है, लेकिन उसका Review करने के लिए सैकड़ौं बिन बुलाए मेहमान चले आते हैं, कोई उनसे मांगता नहीं फिर भी वो Star देने बैठ जाते हैं। वो जनता के रहनुमा बन जाते हैं.. कोई उनसे पूछे कि भई आप फिल्मी Review क्यों करने बैठ जाते हैं, हमने तो नहीं कहा ? आप Lux के नए साबुन का Review तो कभी नहीं करते, कि नहाने में अच्छा है, खुशबू अच्छी है, हाथ से फिसलता बहुत है। या फिर आप Bata की नई चप्पल का Review नहीं करते कि चलने में बहुत ही Smooth है, और काटती भी नहीं है, लेकिन फिल्मी पंड़ित बनकर फिल्म की कुंडली लेकर बैठ जाएंगे बांचने को। क्योंकि फिल्मी दुनिया के लिए वही कहावत है, गांव की लुगाई सबकी भौजाई..।    

 

आत्महत्या चाहें गांव के किसानों की हो, Result आने के बाद Students की हो, या जिंदगी से परेशान किसी कलाकार की.. ये हमारे समाज के लिए बहुत ही दुख की बात है, और इसकी जिम्मेवारी मरने वाले के घर, परिवार, दोस्त, रिश्तेदार, समाज और हम सबकी बनती है, इसमें सिर्फ फिल्मी दुनिया को दोष देना, खुद की जिम्मेदारी से बचना है…। Jia की आत्मा को शांति मिले, ईश्वर से यही प्रार्थना है..

 

RD Tailang

Mumbai

R.D. Tailang
Script Writer

By: Chikita Kukreja

My growing up years
I was born and brought up in Mandla which is in Madhya Pradesh. A small village from where we had to walk 20 kms to reach the main road. Since, my father was in the service class we led a very simple life. So, basically, half of my life was spent in a place which did not bear roads, and the second half, in a place like Mumbai, among rushing vehicles, intelligent lights and sets ofKBC. It’s been 13 years since I’ve been in this city of dreams.

My big break with KBC
I used to make sketches during my childhood. So, once when I had come to Mumbai for a seven day vacation for the first time and got my sketches along. I decided to try my luck at a newspaper office. I went to an afternoon paper called Dopeher, just entered the editor’s cabin to show my artistic work. Within no time he offered me a job, and I willingly took up the proposal. I joined them as a cartoonist and later shifted to hard core journalism. I worked on various beats like crime, sports, film reviewing and even interviewing celebrities.

Later, I joined Plus Channel with Mahesh Bhatt and Amit Khanna. And from then on, there was no looking back. I soon realized that writing was a good field and maybe I could carve a niche in it. My first big assignment came with Farida Jalal’s Star Yaar Kalakar and then Shekhar Suman’s Movers and Shakers happened.

The big break came with KBC. Writing for Bachchanji has been an awesome experience. I’ve worked for him for two years and have written 350 episodes for him. Writing for Bachchanji at the beginning of his career is the biggest award a writer can get. It gives me the same feeling an actor would get on receiving an Oscar.

I begin my day
Sleep is a must for me. It’s like; if possible, I can sleep for 12 hours at a stretch. Normally I get up at around 10 or sometimes even 11. Then, I literally lick the newspaper for say 3 odd hours. It is a must for me. Now there is no time for breakfast so I land up eating my lunch. I am very lazy at times so I prefer to rest for a while after that.

Exercise mantra
Sleeping is really my passion. Even if I try I just cannot get up early in the morning.. Some of my friends do try to influence me to stick to a regime, but then after a few days it’s back to square one. So, it’s me and my dear bed again.

Diet Mantra
I am a strict vegetarian; no eggs, no onion and in fact at my mother’s place, we are not even allowed to bring garlic. I am not a real foodie. I don’t follow any kind of diet mantra, at any point in time. It’s just not my cup of tea. Instead, whenever am upset or annoyed, my wife knows which string to pull. It’s rice with tomato sabzi.

To dine out we love going to Yokos, or grab a pizza at Pizza Hut. And though I am not a Gujarati , I love the Gujarati thali at Rajdhani.

Shopping

I hate shopping but my wife loves it. It’s like if I have to purchase a shirt and if I happen to like a belt too, I will return home with the shirt and go for the belt the next time. I hate window shopping. I am not at all brand conscious but I am definitely quality conscious. We normally shop at Inorbit, as it is very close to our place or else from Infinity in Andheri (W).

Gizmos and Gadgets
I won’t call myself a gizmo freak, but yes, I can call myself as an extremely advanced writer.I am technically very sound. I have a blue tooth attached to my computer, my printer and my mobile phone. I do all my editing work on my advanced computer; right from editing clips to making my own ring tones.

I possess a Nokia 6062 and an Ipod, and very shortly I plan to buy a plasma for myself. My car is fully equipped with a DVD player and a monitor.

Religion
I have been very lucky in my life. It’s like, if my life is a journey by car then I am sure that God is on the driving seat. I believe in the almighty. He has always been on my side right from the very beginning. Everything happened in my life rather unexpectedly. I thank God for all this..

Favourite car
I drive a Scorpio. I just love my car. It’s spacious and we love going for long drives in it.

Reading
To be very frank, I hate reading thick books and novels. Just a look at them makes me perspire. I am happy being a script writer and I don’t think I have any qualities of a writer. But I make it a point to religiously read all regional newspapers. It’s an essential part of my schedule and helps me connect things better while I am scripting.

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Meet the guy behind Big B’s iconic dialogues

Scriptwriter R D Tailang is responsible for some of the most recognised catchphrases on the actor’s popular TV game show

August 18, 2012
MUMBAI
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Amitabh Bachchan is known for some of the most famous on-screen dialogues in the history of Bollywood cinema. However, many a times, the audience rarely gets to know the real face behind such iconic dialogues. We introduce R D Tailang to you, the man responsible for some of the most recognised catchphrases on the actor’s popular TV game show.

R-D-Tailang
R D Tailang

Tailang, who is the scriptwriter of the show, has also lent his pen to films like Ajab Prem Ki Ghazab Kahani and Arjun: The Warrior Prince. His job on the game show, however, is to make sure every single episode has a captivating beginning and a memorable end. And the show’s sixth season is all set to start soon, with Big B busy rehearsing for it these days.

Ask him about his experience with Bachchan and SRK, who hosted season three of the same show, Tailang says, “Bachchanji has the mix of seriousness as well as humour. He emphasizes a lot on diction and when he talks. Even his simple line like, ‘yuh gaya aur yuh aaya’ turns effective. Shah Rukh Khan made the most of his ability to make people laugh. He was engaging, cool and represented youth.”

The writer has managed to remain an integral part of the show from its very inception. So now when you hear AB mouthing “panchkoti mahamoney” and “gadhiyal babu”, you know it’s Tailang weaving those magic words!

Lessons from Big B
Tailang even admitted to having been reprimanded by Big B himself for being a bit careless on his punctuation during the initial days of the show. As they say, all’s well that ends well!

 

… और मेरा घर टूट गया। टूटने से यहां मतलब है, कि हालातों के आगे, समय के आगे, और ख़ुद को उपयोगी बनाए रखने की मांग के आगे मेरा घर टूट गया…। जो लोग मेरे घर तैलंग भवन से परिचित नहीं है, उन्हें में बता दूं, कि मेरे शहर टीकमगढ़ मघ्यप्रदेश का तैलंग भवन यानि मेरा घर एक जाना माना ठिकाना था.. इसकी इमारत का कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं था, लेकिन मज़ाल है कि रिक्शे वाले ने कभी पूछा हो, कि भाईसाब ये कहां पड़ता है। कई बार तो चिठ्ठियां सिर्फ Surname के दम पर ही इस घर में चलीं आती थीं.. अड़ौस पड़ौस के लाग अपने अपने पते पर, लिखते थे, “तैलंग भवन” के सामने, आगे या पीछे, ताकि ये सुनिश्चित हो जाए, कि उनकी चिठ्ठी सही जगह पहुंच जाएगी। Postman को भी बड़ी आसानी हो जाती थी, वो सारे मोहल्ले की चिठ्ठियां हमारे यहां डाल जाता था, क्योंकि लगभग हर चिठ्ठी पर लिखा होता था, तैलंग भवन के पास.. उसके बाद हमारी Duty हो जाती थी, कि वो चिठ्ठियां सही ठिकानों तक पहुंचा दें.. जिन घरों में जवान लड़कियां होती थीं, उनकी चिठ्ठियां पहुंचाने में हमें कुछ ज़्यादा ही दिलचस्पी रहती थी। मेरा वो घर अब शायद अपने अंतिम दिनों में है…

 

बुढ़ापे का परिणाम लगभग एक सा होता है.. चाहे बूढ़ा इंसान हो, या बूढ़ा मकान.. या तो वो टूट जाता है, या बिक जाता है… आखिर मेरा घर भी कब तक अपने आपको बचाए रखता, बूढ़ा जो हो चला था। बुढ़ापे को अक्सर अपनी उपयोगिता सिद्ध् करती रहनी पड़ती है, मेरा घर भी कई सालों से ये कोशिश कर रहा था, वो लगातार ये एहसास दिला रहा था, कि अभी भी वो उपयोगी है, वो बार बार बुलाता था, कि आओ देखो, मेरी मोटी मोटी दीवारों में आज भी वही गर्मी और प्यार है, जिसके बीच तुम पले बढ़े हो। लेकिन कहीं न कहीं घर ये जानता था, कि नए मकानों के लटकों झटकों में उसकी पारंपरिकता को कौन पूछेगा। उसे ये एहसास तो हो गया था, कि वो एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है..। मैं जब भी Mumbai से उस घर में जाता तो उसे मेरे आने की खुशी तो होती थी, लेकिन इस बात की आशा कतई नहीं होती थी, कि अब उसका भला होगा। क्योंकि अक्सर उड़ते उड़ते आवाज़ें उसकी दीवारों तक भी पहुंच जाती थीं, और दीवारों के तो कान होते ही है.. मैं अक्सर Mumbai के चिकने घरों और सुविधाओं की बातें करता था, अक्सर मुंह से निकल जाता था, कि अब इस घर में पैसा लगाना बेकार है.. तो वो सिर झुकाए चुपचाप कसाई के बकरे की तरह कातर निगाहों से देखता था, कि उसकी गर्दन पर छुरा कब पड़ेगा। वो अब अपने आपको भी देखने लगा था.. उसकी दीवारों में POP की चिकनई नहीं थी, उसके दरवाज़े खुलते बंद करते समय आवाज़ करते थे, कोई कमरा ऊंचा था तो कोई नीचा.. और दरवाजों की चौखटें इतनी नीची की दिन में एक दो बार सिर फूटना तो आम बात थी.. लेकिन फिर भी जीवन की आशा तो मरते हुए इंसान के मन में भी होती है। उसे इस बात का एहसास था, कि वो हमें याद दिलाने में कामयाब हो जाएगा, कि उसके पास आज भी वो बड़ा आंगन है, जहां घर के बच्चे खेला करते थे, औरतें शाम को हंसी ठिठोली किया करती थी, और जहां बिना मौकों पर भी हारमोनियम और ढोलक बज उठते थे.. जहां सारा परिवार अपने सुख दुख बांटता था, एकदूसरे के घर जाने से पहले पूछना नहीं पड़ता था.. उसे पता था कि उसका दिल बड़ा है, और शायद इसी दम पर वो अपनी साख बचाए रख सकता है और हमें अपने महत्वपूर्ण होने का एहसास दिला सकता है… लेकिन आजकल जब इंसानों के दिल की कोई कीमत नहीं तो मकानों का दिल कौन देखता है। मेरा घर ये नहीं समझ पा रहा था, कि यही जीवन है, हम जिन बुज़ुर्गों की सीख पर चलकर बड़े होते हैं, बाद में उन्ही सीखों में हमें रूढ़ीवादिता और पिछड़ापन नज़र आने लगता है.. ये समय का फेर है, इससे भला आजतक कोई बचा है..?

 

जब मेरा घर बना था, तब इस सोच के लोग थे, कि घर की आधी रोटी भली.. इसीलिए मेरे घर में भी रोनक रहती थी, छतों से लेकर सीढ़ियों पर कोई न कोई मौजूद होता ही था। हर उम्र के, हर स्वाभाव के, हर तबके के घर के सदस्य.. लेकिन समय का ऐसा फेर हुआ कि मैं मुंबई चला आया, और देखते देखते घर की आधी भली की सोच मिट गई, लोगों के लिए रास्ता खुल गया, उन्हें बड़े घर में घुटन होने लगी, शहर के छोटे मकानों में तरक्की का एहसास होने लगा.. और देखते देखते भीड़भाड़ वाला घर खाली होता गया.. और हालत ये हुए, कि उस घर में कमरे ज़्यादा और रहने वाले कम हो गए.. मोहल्ले की रोनक हमारा घर अब शाम होते ही एक बड़ी अंधेरी छाया नज़र आने लगा.. 

 

लोग कहते हैं, कि मेरे घर को किसी की नज़र लग गई। आज वो खाली है, कोई रहने को तैयार नहीं.. नई पीढ़ी में कुछ एक को छोड़कर तो बाकी किसी को उसके अंदर के रास्ते भी पता नहीं होंगे..। अब ये तो पता नहीं किसी की नज़र लगी या नहीं, लेकिन ये बात भी है, कि हमने अपने घर की कभी नज़र भी नहीं उतारी.. हो सकता है, जब किसी की नज़र लग गई हो जब जब वहां साहित्यकार गर्व के साथ बैठकर अपनी रचनाएं पढ़ते थे, संगीत की महफिलें, कवि गोष्ठियां, चर्चाएं, हंसी, ठहाके तैलंग भवन के अंदर से निकल निकल कर आसपास के घरों को मुंह चिड़ाते थे.. एक तरह से टीकमगढ़ शहर का सांस्कृतिक अड्डा था, लोग सलाहें लेने आते थे, शहर में कोई नामी कलाकार आता था, तो उसे अपने आप हमारे घर लाया जाता था, जैसे मेरा घर किसी राजा की चौखट हो, जहां पर सलाम करके जाना ज़रूरी है… लेकिन राजा की चौखट न सही, लेकिन राजगुरू का घर था तैलंग भवन। हम पीढ़ियों से औरछा राज्य के राजवंश के राजगुरू थे… जी हां वही ओरछा जहां के महलों के सामने Katrina Kaif Slice का Juice पीती नज़र आती हैं, उसी राज्य के राजा हमारे यहां सर झुकाकर आते थे, चप्पले पहन कर आना राजा को भी Allowed नहीं था.. मगर वक्त ने राजाओं को खत्म कर दिया फिर हमारे इस अदने से घर की क्या बिसात..

 

ये शेर तो आप सब ने सुने ही होंगे..

 

याद रख, सिकंदर के हौसले तो आली थे
जब गया था दुनिया से दोनों हाथ खाली थे

अब न वो सिकंदर है और न उसके साथी है
जंगजू न पोरस है और न उसके हाथी है

कल जो तनके चलते थे अपनी शान-ओ-शौकत पर
शम्मा तक नहीं जलती आज उनकी तुर्बत पर

ऐसा दुनिया में पहली बार नहीं हो रहा था, कि हमारा घर हमसे दूर हो रहा हो.. दरअसल ऐसा सारे देश में ही हुआ है, या हो रहा है, पुराने घर अब सभी से दूर हो रहे हैं.. क्योंकि अब पुराने घर, आंगन, तुलसी का पौधा, आम का पेड़, हमें सुकून तो देते हैं, लेकिन जीवन की सुविधाएं, सुरक्षा और पैसा नहीं दे पाते.. और सुकून से दिल तो बहल सकता है, लेकिन घर नहीं चलता.. इसलिए सभी अपने छोटे शहर के बड़े घरों से दूर होते होते, बड़े शहर के छोटे घरों में आने को मजबूर हो गए। और बड़े घर इस बदलाव पर हैरानी से हमें देखते हैं, कि न जाने कहां कब क्या हो गया…। हमारे घर के दूर होने पर भले ही हमें दुख लगे, लेकिन उसका भविष्य हमेशा की तरह उज्जवल ही है। आज उसमें रहने वाले वाशिंदों का भले ही पलायन हुआ हो, और वो दूसरे शहरों में बस गए हों, लेकिन सबका भला ही हुआ है। और ये ज़रूरी था, गतिशील होना विकास की निशानी है, क्योंकि गति में ही प्रगति है। बहता पानी हमेशा अच्छा होता है, रूका पानी सड़ जाता है, खून जब तक धमनियों में बहता रहता है, जीवन चलता रहता है, रूक जाता है, तो उस अंग को खराब कर देता है.. एक फूल गिरता है तो चार नए खिलते हैं, प्राचीन को नवीन के लिए जगह बनानी ही पड़ती है। आज भले ही तैलंग भवन में रहने वाले वाशिंदे बदल रहे हों, और वो इसे इसके मौजूदा हाल में रखें या फिर पुनर्निमाण करें, तैलंग भवन को एक नया रूप मिलेगा, उसमें नई उर्जा का संचार होगा..। हर व्यक्ति के साथ की एक समय सीमा होती है, हमारे अपने भी कुछ समय बाद हमसे बिछड़ जाते हैं, इसी तरह जीवन चलता है, और इसी तरह तैलंग भवन भी चलेगा, भले ही उसका स्वरूप दूसरा हो, नाम भी दूसरा हो, लेकिन उसकी आत्मा वही रहेगी.. मैंने कौन बनेगा करोड़पति के लिए कुछ पंक्तियां लिखीं थी, जो मैं अपने घर को समर्पित करना चाहता हूं –

 

अपना घर अपने जीवन का आधार है, जिंदगी भर की मेहनत का आभार है, बरसों की उम्मीदों का आकार है,

घर की हर चीज़ में यादों का बसेरा होता है, बुर्जुगों की दुआओं का डेरा होता है,

और अपने घर में एहससास भी वैसा होता है, जैसे कोई बच्चा अपनी मां की गोद में आ के सोता है…

 

मेरा घर जिसके साथ भी रहे, हमेशा आबाद रहे..

 

RD Tailang

© Sequin Entertainment Pvt. Ltd 2012.

Mumbai

 

  

बवासीर का दर्द कैसा होता है, मुझे नहीं मालूम, क्योंकि मुझे कभी नहीं हुआ.. लेकिन शायद कुछ वैसा ही होगा, जैसा की फिल्मी हस्तियों को Bollywood शब्द सुनकर होता है। कहते हैं, कि Bollywood मत कहो.. ये एकदम वैसा ही Reaction है, जैसे कि एक Serial “हम पांच” में एक अधेड़ महिला, Aunty कहने पर शिकायत करती थी, कि Aunty मत कहो.. उसी तरह से आजकल बड़े बड़े Super Stars, Directors, Writers कहते हैं, Bollywoo मत कहो। 

 

वैसे Bollywood शब्द न कहने देने के पीछे इनकी बहुत अच्छी सोच है। इन Anti Bollywood वाले लोगों का मानना है, कि ये शब्द ऐसा लगता है, कि जैसे हमने Hollywood से Copy कर लिया हो…। ह ह ह हंसी तो इतनी आ रही है, कि Blog में से हंसी की आवाज़ आने लगे.. ये तो गांव के ज़मीदार ठाकुर वाली बात हो गई, कि उसे नीची जाति की गांव की जवान लड़की के साथ हमबिस्तर होने में, उसका बलात्कार करने में परहेज नहीं है, लेकिन उसे अपने कुंए से पानी नहीं भरने देगा..

 

इन्हें Hollywood की Copy Bollywood से परहेज है, लेकिनHollywoodकी पूरी कहानी, उनके Heros के Look, उनकी DVD और यहां तक कि उसके Posters की Copy करने में कोई परहेज नहीं है।

इन्हें Bollywood सुनने में दर्द होता है, लेकिन हिंदी में बात करने में गर्व नहीं होता। इन्हें हिंदी फिल्म जगत कहना पसंद है..लेकिन हिंदी की Script, English में पढ़ना अच्छा लगता है। जो Bollywood इन्हें Hollywood की Copy नज़र आता है, उसीHollywoodके लिए एक Extra बनने में ये जान लगा देते हें।

 

मैंने एक Bollywood विरोधी को पकड़ा और पूछा कि आखिरी क्या बात है, Bollywood में ऐसी कौन सी मिर्ची लगी है, जो सुनते ही जलन होने लगती है..। उनके श्रीमुख से जो शब्द निकले वो शायद आसाराम बापू या रामदेव भी बताने में असमर्थ रहते..। वे कहते हैं  “इस देश की एक महान संस्कृति रही है, कि जिसका खाओ, उसी की बजाओ..। इस नीति से बहुत भला होता है। एक तो खिलाने वाले का एहसान नहीं चढ़ता, चढ़ेगा भी कैसे, जिसने खाना खिलाया, अगर उसी के खाने की बुराई कर दी जाए, तो खिलाने वाला “नमक का कर्ज़” जताने की बजाए, Backfoot पे चला जाता है, उसे लगता है, कि उसने गंदा खाना खिला दिया। इसीतरह यदि Hollywood पे Based Bollywood की इतनी बुराई कर दी जाए, कि Hollywood को भी लगे कि ये हिंदी फिल्म वाले हमसे चिड़ते हें, तो ये बेचारे हमारी फिल्मों को क्या चुराते होंगे..।”

 

फिर एक नई नवेली अभिनेत्री थीं, जिनसे मैंने Hollywood Bollywood विवाद के बारे में कुछ बात करने की ज़रूरत नहीं समझी थी, लेकिन फिर भी उन्होंने जबरदस्ती अपनी राय को मेरे पीछे लगा दिया.. उनकी राय मुझसे बोली.. कि देखिए, फिल्मी दुनिया में किसी चिड़ना, cool होने की निशानी है.. अगर आप Anurag हैं, और Amitabh से चिड़ते हैं, यानि आप Cool हैं, अगर आप Salman हैं, और Press से चिड़ते हैं, तो भी cool हैं.. अगर आप RamGopal Varma हैं, और Karan Johar से चिड़ते हैं, तो Super cool हैं, इसीलिए आपको अगर फिल्म Line में cool बनना है, तो Bollywood शब्द से बहुत बुरी तरह से चिड़ना होगा..

 

ये तर्क सुनकर मुझे भी Bollywood से बहुत चिड़ होने लगी, और जैसे ही मुझे चिड़ मची, तो मुझे अपने अंदर एक ठंडक का एहसास हुआ.. और ये Mumbai का मौसम बदलने के कारण नहीं था, मैं अचानक Cool हो रहा था.. ठंडा ठंडा cool cool.. 

तभी अचानक किसी ने पीछे से कहा – भाई साब ये Bollywood में एक बहुत ही धांसू Hero आया है..

मैंने उसे घूर के देखा, और कहा Bollywood..? तेरी…

 

RD Tailang

© Sequin Entertainment Pvt.Ltd.

Mumbai

 

स्टीव दादा नहीं रहे… कौन Steve? अरे भई Apple वाले Steve Job दादा नहीं रहे… पूरी दुनिया में मातम छा गया… लोगों को अपने दादा के मरने का शायद उतना ग़म न हो, जितना Steve दादा का हुआ…। सब रोने लगे… जिनके पास भी iphone, iMac, ipad, ipod.. जो भी था, वो रो रहा था… अखवार रो रहे थे, Channel रो रहे थे… कुछ लोग इसलिए भी रो रहे थे, ताकि वो ये साबित कर सकें, कि वो भी Steve दादा का Product इस्तेमाल करते हैं…

 

लोग कह रहे थे, कि तीन सेवों ने यानि Apples ने दुनिया बदल दी… एक Apple Adam और Eve ने खाया था, तो दुनिया बन गई… दूसरा Apple Albert Einstein के सर पर गिरा तो दुनिया को गुरूत्वाकर्षण यानि Gravity का पता चला… तीसरा Apple Steve दादा का था, जिसने Computers और phone की दुनिया बदल दी… वो बात अलग है, कि पहले दो सेवों की करतूतों ने आम दुनिया को फायदा पहुंचाया, लेकिन Steve भईया के Apple का उन्ही लोगों को पता था, जो इस बात को मानते थे, An apple in a day keep doctors away… आम आदमी का तो Apple से तभी वास्ता पड़ता है, जब वो लड़की वाला बन कर लड़के वालों को सगाई के समय 1 किलो सेव भेंट देता है…  इन एक किलो सेवों का महत्व सगाई की सोने की अंगूठी से कम नहीं होता…

 

तो अपने Steve भईया ने भी हमें एक Apple दिया… हांलांकि वो जूठा Apple था… कुतरा हुआ.. अब पता नहीं, कि वो Steve ने कुतरा, या फिर चूहे ने… लेकिन हम सब खुश होते रहे… कि भले जूठा हुआ तो क्या हुआ, किसी ने हमें सेव लायक तो समझा… और हम Steve भईया के जूठे Apple को पाकर खुश होते रहे… पहले Apple बड़े बड़े देशों में Launch होता, जब वो खा खा के थक जाते… तब जा के Apple भारत में आता… लेकिन हम खुश हो जाते… और मन को समझा लेते… कि कोई बात नहीं… पहले अमरीका और इंगलेंड Apple खा लें, फिर बचेगा तो हमें भी मिल जाएगा… Steve दादा ने कभी ये नहीं सोचा, कि भारत का बाज़ार भी बड़ा है, और वहां भी उनके सेव अच्छे खासे बिक सकते हैं…  कुछ लोगोँ को तो Apple खाने का इतनी तलब लगती… कि वो चोरी छिपे लाया हुआ Apple ही खा लेते… और उसे बड़ी शान से हाथ में लेकर घूमते, और बताते भी, कि ये वही Latest Apple है, जिसे India में launch करने लायक नहीं समझा गया, लेकिन उन्होंने किसी तरह जुगाड़ कर लिया है… और उसे Break करके वेा इस्तेमाल भी करने लगे हैं…  बचपन में चुरा के तो हमने भी Apple खाए हैं, लेकिन हमेशा कोशिश यही थी, कि किसी को पत न लग जाए… लेकिन ये Steve भ्ईया का Apple था, कोने के ठेले वाले बंसी लाल का नहीं…

 

लेकिन कुछ भी हो, Steve दादा के जाने का दुख हमें भी हुआ… अनाथ थे, लेकिन आदमी अच्छे थे… भारत भी आ चुके थे, हांलांकि भारत में उनके अनुभव ज्यादा अच्छे नहीं रहे… सुनते हैं, उस समय उन्हें किसी सन्यासी ने ठग लिया था… वैसे ये बात नई नहीं थी, सन्यासी हमेशा से ही लोगों को ठगते आ रहे हैं, कभी धर्म के नाम पर, तो कभी चमत्कार के नाम पर… पर Steve दादा को इस बात का दुख हुआ, और उन्होंने फिर कभी पलट कर यहां नहीं देखा… हो सकता है, इसीलिए… उनके Apple सारी दुनिया में तो बिकते, लेकिन भारत में देर से ही आते… ठीक वैसे… जैसे कोई नई फिल्म शुक्रवार को तो महानगरों में release होती हैं, लेकिन गांव खेड़ों के सिनेमा Hall में दो चार हफ्ते के बाद ही पहुंचती है… Steve दादा के लिए, भारत भी किसी गांव खेड़े से कम नहीं था…

 

हमारे हिसाब से Steve दादा की बनाई हुई चीज़ों में बहुत सी कमियां थीं… लेकिन हालत ऐसी कि मज़ाल है कोई कमियां निकाल दे… लोग ऐसे react करते, जैसे किसी को Modern Art समझ नहीं आती, या English Film जिन्हें समझ नहीं आती, तो दूसरे उसे कैसी हीन भावना से देखते हैं… भले उन्हें भी समझ न आई हो… मैंने एक Apple fan से पूछा, कि भाईसाब, आपके Phone में तो कुछ Basic Feature ही Missing हैं… तो उसने मुझे ऐसे देखा, जैसे नाके के किसी पनवाड़ी ने MF Husssain की Painting खरीद ली हो… बोला, अगर Apple खाना है, तो जैसा है वैसा खाओ…

 

Steve दादा की सफलता का यही आलम था… जैसे हम अपनी कमियों को ऊपर वाले की कृपा मानकर संतोष कर लेते हैं, कि ऊपरवाले ने अगर टांग तोड़ दी है, तो कुछ सोच कर ही तोड़ी होगी… क्योंकि भगवान जो कुछ करता है अच्छा ही करता है… उसी तरह Steve दादा जो बनाते हैं, अच्छा ही बनाते हैं… ये स्थान प्राप्त कर लेना, जिंदगी में बहुत बड़ी उपलब्धि है, कि जब लोग आपकी कमियां मानने और देखने को तैयार न हों… ये चमत्कार Steve दादा ने कर दिखाया, ये वाकई बहुत बड़ी बात है… मैं Steve दादा का Fan नहीं रहा, लेकिन वो जहां भी हैं, जैसे भी हैं, उन्हें बहुत बहुत श्रृद्धांजलि…

 

Written by : RD Tailang

© Sequin Entertainment Pvt. Ltd. 2011

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सदियों तक गुमनामी के अंधेरे, पिछड़ेपन, और इंसानी उपेक्षा में जीने के बाद, अचानक एक दिन, नाक के बालों ने विद्रोह कर दिया…। दबा हुआ दर्द विद्रोह बन कर फूट पड़ा… नाक के बालों ने नाक में दम कर दिया…। उनका एक मुखिया बाल बढ़कर… नाक से मूंछों तक पहुंच गया… और कहने लगा… “इंतज़ार, धैर्य, सहने की भी हद होती है… सदियां हो गईं, इंसान की नाक की तंग, अंधेरी और सीलन भरी गलियों में सड़ते हुए… आजतक इंसान ने हमारे बारे में कुछ सोचा…? तुम्हारे सर के बालों की तरह हम भी बाल है… पर हमें इतने सालों से इंसान की नाक में रह कर क्या मिला…? सिर के बालों को इतना मान और हमें अपमान…? सर के बालों के लिए तरह तरह के तेल, Lotion Cream, conditioner… और हमें… बहती हुई नाक का गटर…?

सिर क्यों… हमसे कुछ ही दूरी पर, मूछों के बाल… उन्हें एंठकर तुम अपनी मर्दानगी दिखाते हो… और वहां से थोड़ी ही दूर पर हम ऐसे… जैसे अंबानी की इमारत के आसपास झुग्गी झोपड़ी… आखिरी बाल से बाल का भेदभाव क्यों… ? हम वो बाल हैं, जो तुम्हारी सांसों में धूल, कचरे को तुम्हारे फेंफड़ों तक पहुंचने से रोकते हैं, वर्ना अब तक दम घुट कर मर गए होते…? सर के बाल बढ़ते हैं, तो तुम उनको संवार कर, अपनी Style पे इतराते हो… लेकिन हम बढ़कर नाक से झांकने भी लगें तो तुम कैंची अंदर तक घुसा कर हमारी गर्दनें काट देते हो, क्यों? अपनी नाक की शान तो तुम्हें इतनी है कि अगर तुम्हारी नाक पे बात आ जाए, तो तुम किसी की जान लेने में नहीं हिचकिचाते… फिर नाक के बालों की इतनी तौहीन क्यों…? “

मैंने नाक के बढ़े हुए बाल को प्यार से सहलाया, थोड़ा बहलाया, और बोला… “भाई मेरे हमारे मन में बाल के प्रति कोई भेदभाव नहीं है… दरअसल हमारा तुम पर आज तक ध्यान गया ही नहीं…।” वो बोला… “आखिर जाएगा भी कैसे… जो हम तुम्हारे Vote bank नहीं हैं न.. हम तुम्हारी सुंदरता में इज़ाफा नहीं करते, हम माथे पर बिखरकर तुम्हारी जुल्फें नहीं कहलाते… तुम लोग उन्हीं पर ध्यान देते हो… जो तुम्हारे सामने हैं… जिनसे तुम्हारी Image बनती है… लेकिन वो तुम्हारे लिए कोई मायने नहीं रखते, जो तुम्हारे आगे लहराते नहीं है… अगर ऐसा ही होता… तो आसाम, मणिपुर, मिजोरम, अरूणाचल जैसे राज्य भी उसी तरह इतराते जैसे MP UP राजस्थान इतराते हैं… दरअसल तुम्हारे लिए, पूर्वी राज्य भी नाक के बाल ही हैं…” 

मैंने कहा – “नहीं यार, हम क्या करें… हम क्या करें… हमने तुम्हें नाक के अंदर थोड़े ही डाला है, ये तो ऊपर वाले ने तुम्हें वहां जगह दी है…।” बाल बड़े ताव में बोला.. “वाह, अब भगवान के ऊपर ठीकरा फोड़ दिया… अरे भगवान ने तो भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, भेदभाव, अत्याचार, इन सबको तुमसे दूर रखा था, उसे तो तुम कहां से उठाकर अपने पास ले आए…। तुम लोगों को जब भी मौका मिलता है, तुम अपने हिसाब से चीज़ें जमा लेते हो… तब भगवान याद नहीं आते… आज भगवान की दुहाई दे रहे हो…?”  

 

अब वो गुस्सा कम और दुखी ज़्यादा लग रहा था… ऐसा लग रहा था, जैसे उसकी आंखें नम हो गई हों… उसने कहा – “हमने आज तक कोई Demand नहीं की… हम जिंदगी भर तुम्हारा साथ निभाते हैं… सर के बाल वक्त आने पर झड़ जाते हैं… लेकिन हम आखिर तक तुम्हारा साथ निभाते हैं… सर के बाल, मौका मिलते ही अपना रंग बदल लेते हैं… लेकिन हम आखिरी दम तक काले रहते हैं… फिर भी हमारे बारे में तुमने एक पल भी नहीं सोचा होगा…” 

 

मैने अपनी उपेक्षा को एक Philosophy का रंग देने की कोशिश की… मैंने कहा कि – “देखो, इमारत के कंगूरे की हर कोई तारीफ करता है, लेकिन ईमारत जानती है, कि अगर वो आज सीधी खड़ी है, तो नींव के पत्थरों की वज़ह से…।” वो एकदम से भड़क गया… बोला.. “कब तक ये बातें कर कर के मेहनत करने वालों को उल्लू बना कर जिंदगी भर गढ्ढे में धकेलते रहोगे…? तुम्हारी इसी फालतू Philosophy की वजह से कंगूरे के पत्थरों की तरह चापलूस लोग, दुनिया की चकम दमक में जिंदगी भर फायदे की मलाई खाते हैं… तारीफ पाते हैं, और अपनी चमकीली किस्मत पे इतराते हैं… और मेहनती नींव के पत्थर सदियों से ज़मीन के नीचे दफन पड़े होकर खुश होते रहते हैं, कि वो इमारत को खड़ा रखे हैं… वो बुद्धू ये नहीं जानते हैं, कि उन्हें वेवकूफ बनाया गया है… और बलिदान का पाठ पढ़ाकर, प्यार से दफनाया गया है…” 

 

नाक के बाल के तर्को के आगे मेरी नाक झुक चुकी थी… ऐसा लग रहा था, कि अब ये बाल मेरी सांसें बंद कर देंगे… लेकिन नाक के बाल ने वापस नाक में घुसते हुए कहा… “ये ज़रूरी नहीं, कि तुम हमें सर पे बिठाओ… लेकिन इतना ध्यान रखो, कि जो तुम्हारी पीठ पीछे मेहनत करते हैं, उनको भी कभी कभी याद कर लिया करो… आखिर नींव के पत्थर भी सांस लेते हैं…!!”

 

Written by : RD Tailang

© Sequin Entertainment Pvt. Ltd. 2011

 

 

 

 

 

  

 

 

 

 

 

 

और एक दिन वही हुआ, जिसका मुझे डर था… अचानक अन्ना ने आंदोलन छेड़ दिया… कि अब इस देश में भ्रष्टाचार नहीं चलेगा… दिल पे गाज़ तो गिरनी ही थी… भ्रष्टाचार की जिस संस्कृति में हम पैदा हुए, पले, बढ़े, जवान हुए… उसके विकास में अपना भी योगदान दिया… अन्ना ने आकर अचानक उसे बुरा कह दिया और बोला कि आज से ऐसा करना खराब है… ये तो वही बात हो गई… कि जिस पत्नी के साथ इतने दिनों गुज़ारे हों… पड़ौसी आकर एक दिन बोल दे.. कि वो तो डायन है… मन कैसे मानेगा इस बात को… पर अन्ना कह रहे हैं, इसलिए मानना भी पड़ा, कि भ्रष्टाचार हमारे लिए वाकई बुरा है…

अन्ना से पहले हमें अपने भ्रष्टाचारी होने पर कितना गर्व था… हमारा आत्मविश्वास किस हद तक ऊंचा था, हम बिना Insurance की गाड़ी बेधड़क चलाते थे… क्योंकि हमें विश्वास था, कि अगर पकड़े जाएंगे, तो 50 रूपये से ज़्यादा नहीं लगेगा… देश का ऐसा कौन सा युवा है, जिसने बिना Driving License की गाड़ी नहीं चलाई हो… कभी पकड़े भी गए… तो 20 रूपये से ज़्यादा किसी हवलदार ने Demand नहीं की… आज स्थिति बिल्कुल बदल गई है, हर टोपी वाला हवलदार अन्ना नज़र आता है… गाड़ियां निकालने में डर लगता है… वो 50 रूपये वाला आत्मविश्वास खत्म हो गया है… पहले Road पे बिना Papers की गाड़ी भी जिस शान से लहराते हुए चलते थे… आज हाथ कांपने लगे हैं… ईमानदारी ने आत्मविश्वास पर ज़बरदस्त चोट की है… और देश के विकास के लिए, उसके नागरिकों का आत्मविश्वासी होना बहुत ज़रूरी होता है…

आज सारा देश कह रहा है, “मैं भी अन्ना…” जो खा रहा है वो भी अन्ना कहता है, और जो खिला रहा है वो भी अन्ना है… जब सारा देश अन्ना है, तो भ्रष्ट कौन है…? जब एक अन्ना दूसरे अन्ना को नहीं खिलाएगा, तो कौन खिलाएगा… ?

अन्ना की वजह से, हमारी तो सारी पढ़ाई ही बेकार हो गई… हिंदी के Papers में हमने ” जेब गरम करना” जैसे मुहावरों का अर्थ बता बता कर, कितने Marks हासिल किए थे… लेकिन भ्रष्टाचार खत्म होते ही, ये सारे मुहावरे भी निरर्थक हो जाएंगे… टेबिल के नीचे से लेना, ऊपरी कमाई, रंगे हाथों पकड़े जाना… जैसे सारे वाक्य अचारक खत्म हो जाएंगे, जो अभी तक हमारी पढ़ाई लिखाई का एक हिस्सा थे…

अन्ना को क्या है… अन्ना को Passport नहीं बनवाना… उन्हें राशन कार्ड भी नहीं चाहिए… वो गाड़ी भी Drive नहीं करना… बच्चों का Admission भी नहीं कराना… और तो और वो 15 -16 दिन भूखे भी रह सकते हैं… इसलिए वेा बिना भ्रष्टाचार के रह सकते हैं… वर्ना उनसे कहिए… Agent को बिना 2500 रूपये दिए Driving License बनवा लें तो मान लेंगे देश में ईमानदारी आ चुकी है… या फिर जिन्होंने रामलीला मैदान में किरण बेदी का अभिनय देखा है… वे अपने अपने शहर में जाकर, सारे Traffic नियम पाल रहे होंगे, या लौटते समय, चालू टिकट लेकर, Reservation डब्बे में न घुसे होंगे … तो समझेंगे अन्ना सफल हो गए हैं, और भ्रष्टाचार खत्म हो गया है…

पर मानना पड़ेगा अन्ना को… भ्रष्टचार भले खत्म हो या न हो… उन्होंने देश के उस युवा वर्ग को कमरे से बाहर ला दिया, जो दिन भर Face book के बैठा बैठा… या तो Photo upload करता रहता था, या Chat में लगा रहता था…  टोपी भले Fashion से ही सही, लेकिन Anna ने सबको टोपी पहना ही दी…

R D TAILANG

 

 

 

 

 

 

 

 

आज मैंने कौन बनेगा करो़ड़पति की शुरूआत में, श्री अमिताभ बच्चन के लिए ये पंक्तियां लिखीं… वो KBC के Set पे आकर, ये पंक्तियां बोलते हैं…

मैंने यहां हिंदुस्तान महसूस किया है… मैंने यहां हिंदुस्तान महसूस किया है… यूं तो मैं, देश के कोने कोने में घूमा फिरा… कभी देखा एक छोर, तो कभी छुआ दूसरा सिरा… मगर मैंने हिंदुस्तान यहां महसूस किया है…

हमें जो लाखों Calls मिले, वो महज़ आकड़े नहीं थे… उसमें थी मंज़िलें, किसी के सपने यहीं थे… किसी में छिपी थी मां की बीमारी… कोई बच्चे को दिखाना चाहता था दुनिया सारी… इस खेल ने जीवन को कितना दिया है… मैंने यहां हिंदुस्तान महसूस किया है…

यहां खिलाड़ी साथ लाता है अपना गांव… पीपल की छांव, कौवे की कांव कांव… शहरों की रंगत भी यहां आती है… गांव की संगत में वो भी खिलखिलाती है… यहां सबके सपने एक होते हैं… एक की हार पे, दिल सभी के रोते हैं… ये खेल जब भी आता है, किसी का घर बन जाता है, कोई कर्ज उतर जाता है, कहीं जीवन संवर जाता है… इस खेल ने जीवन को कितना दिया है, मैं यहां हिंदुस्तान महसूस किया है…

R D TAILNG